- By Dr Seema Singh
गाँव में रोटी की दिक्कत थी,तो भाग कर दूर शहर में चले गए! वहीं कुछ काम धंधा ढ़ूढ़ लिया और कमाने खाने लगे !ज्यादा जरूरतें नहीं होतीं बस रोटी मिल जाए, कुछ कपड़े -लत्ते और कहीं भी डेरा जमा कर गुजर बसर कर लेते हैं!
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ज्यादा बड़े सपने नहीं देखते ये लोग, बस पेट भर जाए, बच्चों के साथ कहीं भी सिर छुपा के जी लेते हैं! थोड़ा बहुत पैसा जो बचा लिया अपना पेट काट कर, वो गाँव में माँ-बाप के पास भेज देते हैं ! ऐसे ही रोज़ कमाया और खाया चलता रहता है! कभी -कभार गाँव जाने का मौका मिला तो जाकर सबसे मिल आते हैं! फिर शहर लौटकर अपने काम में लग जाते हैं ,बस यही चक्र चलता रहता है!
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लेकिन इस बार इस कोरोना वायरस ने तो सारी गणित ही बिगाड़ दी इन लोगों की! लॉकडाउन हुआ तो जैसे इनका जीवन ही लॉक हो गया, काम छूट गया तो रोजी -रोटी पर जैसे डाका ही पड़ गया हो! अब क्या खाएँ और कहाँ रहें! सरकार कहती रही कि जहाँ हो वहीँ रहो पर घर से दूर बिना पैसे के एक-एक दिन काटना युगों के बराबर लगता है!
फोटो -सोशल मीडिया
सरकार की तरफ से मिलने वाला राशन और भोजन सभी की भूख नहीं मिटा पाता और रोज़ खाने के लिये किसी सरकारी मुलाजिम के आगे हाथ फैलाना भी तो अच्छा नहीं लगता!
गरीब हैं तो क्या हुआ कुछ स्वाभिमान और खुद्दारी भी तो होती है! इसलिये ये बार-बार का बढ़ता लॉकडाउन बेचैन करने लगा! बस यही समझ में आता है कि अब अपने गाँव वापस जाना है, चाहे जितनी भी मुश्किल आए !
फोटो -प्रवासी मजदूरों का पलायन
अब तो बस गाँव जा कर ही दम लेंगे, चाहे डेढ़ हजार किलोमीटर की लम्बी दूरी पैदल ही क्यों न तय करनी पड़े! जो कुछ एक दो झोले थे, उन्हें उठाया और चल दिये, छोटा बच्चा है या गर्भवती पत्नी है तो क्या हुआ है तो है! सभी को पैदल चलना ही होगा!
फोटो -प्रवासी मजदूरों का पैदल ही पलायन
लोगों की परेशानी, उनके घर जाने की तीव्र इच्छा को देखते हुए सरकार ने विशेष श्रमिक रेलगाडी़ चला दी और श्रमिकों को उनके गाँव वापस भेजना शुरू कर दिया! जिन्हें ट्रेन मिल गई, वो तो बहुत खुश थे क्योंकि वे बहुत दिनों की तकलीफ झेलने के बाद घर जा रहे थे !स्टेशन पर उतरने के बाद पूरा जिला प्रशासन और चिकित्सकों की टीम उनका इंतज़ार करती हुई मिली! उन्हें पानी, मास्क और लंच पैकेट भी सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए थे!
फोटो -श्रमिक ट्रेन से लौटते लोग
वहीं दूसरी तरफ बहुत से लोग अभी भी पैदल यात्रा करते हुए मिले! इसकी वजह क्या हो सकती है जब ट्रेन चल रही हैं तो ट्रेन से ही जाना चाहिये! हो सकता है कि वे लोग सरकार की बात मान ही न रहे हों, लेकिन पैदल चलना किसी का शौक तो नहीं हो सकता! जरूर कुछ तकनीकी समस्या होगी, जैसे कि ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन हो रहा हो ट्रेन के लिये जो कि उन मजदूरों को करना ही नहीं आता !या फिर कुछ और समस्या हो सकती है!
फोटो -सोशल मीडिया
कहीं छोटी सी गाड़ी खुद ही बनाकर, उसमें पत्नी और बच्चे को बिठाकर हाथों से खींचते हुए पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय किये जा रहे हैं! कहीं रेलवे ट्रैक पर थक कर बैठ गए और सो गए, रात में मालगाड़ी कुचलते हुए चली गई! सोलह लोग जो कोरोना से बचे हुए थे लेकिन एक ट्रेन से मर गए! सभी कहानियाँ दुखद हैं लेकिन यही सच्चाई है!
फोटो -रेलवे ट्रैक पर मृत मजदूरों की बिखरी रोटियाँ
भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या और उसके साथ अब तक न खत्म हुई गरीबी इस समय कोरोना से भी अधिक चिंता का विषय बन गए हैं! देश के समक्ष चुनौती है कि कोरोना वायरस से पहले लड़े या फिर गरीबी से! इसीलिये सरकार ने दोनों समस्याओं के साथ एक ही समय लड़ना प्रारंभ कर दिया है! अपने देश को और यहाँ के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने पर सरकार जोर दे रही है! अब लोकल के लिये वोकल बनना है!
--डॉ सीमा सिंह



ये देश की इस समय एक ज्वलंत समस्या हैं।
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