दिल्ली में पिछले तीन दिनों से हिंसा हो रही है या यूँ कहें कि दिल्ली जल रही है, आखिर कौन हैं वो लोग जो हिंसा फैला रहे हैं! ये नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोधियों का काम है या फिर किसी और का!
भीड़ के पास दिमाग नहीं होता, वह इंसानियत भी नहीं जानती और मानवता भी नहीं जानती! भीड़ बस आवाजें सुनती है और तांडव मचाती है! किन्तु सोचने की बात है कि ये भीड़ है किसकी, किसके निर्देश पर ये जला रही है दिल्ली को!
भीड़ के पास दिमाग नहीं होता, वह इंसानियत भी नहीं जानती और मानवता भी नहीं जानती! भीड़ बस आवाजें सुनती है और तांडव मचाती है! किन्तु सोचने की बात है कि ये भीड़ है किसकी, किसके निर्देश पर ये जला रही है दिल्ली को!
कुछ लोगों का कहना है कि भड़काऊ भाषण दिये गए इसीलिये दिल्ली में हिंसा भड़क गई! हो सकता है यही कारण हो लेकिन भड़काऊ भाषण तो कई लोगों ने कुछ समय पहले भी दिये थे यहाँ तक कि सौ करोड़ लोगों को मिटाने तक की बात की थी परन्तु तब तो हिंसा नहीं भड़की थी! क्या इस हिंसा के पीछे किसी आतंकवादी समूह की साजिश है क्योंकि यह हिंसा तब शुरू हुई जब हमारे देश में अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपनी पहली यात्रा पर आए हुए थे! कारण कोई भी हो लेकिन यह हिंसा हर मायने में निंदनीय है!
गोली चलाते हुए हिंसक दंगाई
इस हिंसा में अब तक बाइस लोगों की मौत हो चुकी है और बहुत से लोग घायल हैं! ड्यूटी पर तैनात एक हेडकांस्टेबल रतन लाल की इसी हिंसा में मौत हो चुकी है !आखिर रतन लाल ने किसी का क्या बिगाड़ा था वो तो बीमार थे फिर भी अपनी ड्यूटी कर रहे थे! उनके परिवार ने जो खोया है उसकी भरपाई कोई नहीं कर पाएगा! उनकी पत्नी और तीनों बच्चे जिस दुख और तकलीफ़ से गुजर रहे हैं उसकी अनुभूति इन दंगाइयों को कभी नहीं होगी!
| शहीद हेड कांस्टेबल रतन लाल |
हेड कांस्टेबल रतन लाल का परिवार
आखिर हिंसा को शुरू होते ही क्यों नहीं कुचल दिया
गया !किसकी कमी रह गई, शासन की या प्रशासन की! ये तो नहीं पता कि मरने वालों में कितने उपद्रवी हैं और कितने निर्दोष लोग हैं! जब दिल्ली पुलिस पर्याप्त नहीं थी इस हिंसा को नियंत्रित करने में तो पहले से ही अर्ध सैनिक बल क्यों नहीं तैनात किये गए! किस बात का इंतजार किया जा रहा था, ट्रंप के जाने का या फिर कुछ और! हिंसा को शुरुआत में ही नियंत्रित कर दिया जाता तो शायद इतने लोग नहीं मरते!
दिल्ली हिंसा पर कड़े कदम उठाए जाने की जरूरत है !यह राजनीति करने का वक्त नहीं है, यह एकजुट होकर शांति स्थापित करने का समय है! इस हिंसा को साम्प्रदायिक चश्मे से देखने की भी जरूरत नहीं है! क्योंकि यदि इसे हिन्दू और मुस्लिम का रूप देने की कोशिश की गई तो यह रुकने के बजाय और उग्र होगी क्योंकि कट्टर लोग दिमाग से नहीं दिल से फैसले लेते हैं!
--डॉ सीमा सिंह

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