Wednesday, February 26, 2020

दिल्ली हिंसा में 42 लोग मर चुके हैं : आखिर कौन है इसका जिम्मेदार

        दिल्ली में पिछले तीन दिनों से हिंसा हो रही है या यूँ कहें कि दिल्ली जल रही है, आखिर कौन हैं वो लोग जो हिंसा फैला रहे हैं! ये नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोधियों का काम है या फिर किसी और का!
          भीड़ के पास दिमाग नहीं होता, वह इंसानियत भी नहीं जानती और मानवता भी  नहीं जानती! भीड़ बस आवाजें सुनती है और तांडव मचाती है! किन्तु सोचने की बात है कि ये भीड़ है किसकी, किसके निर्देश पर ये जला रही है दिल्ली को!

             कुछ लोगों का कहना है कि भड़काऊ भाषण दिये गए इसीलिये दिल्ली में हिंसा भड़क गई! हो सकता है यही कारण हो लेकिन भड़काऊ भाषण तो कई लोगों ने कुछ समय पहले भी दिये थे यहाँ तक कि  सौ करोड़ लोगों को मिटाने तक की बात की थी परन्तु तब तो हिंसा  नहीं भड़की थी! क्या इस हिंसा के पीछे किसी आतंकवादी समूह की साजिश है क्योंकि यह हिंसा तब शुरू हुई जब हमारे देश में अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपनी पहली यात्रा पर आए हुए थे! कारण कोई भी हो लेकिन यह हिंसा  हर मायने में निंदनीय है!                                                                    
                     गोली चलाते हुए हिंसक दंगाई                                 
                  इस हिंसा में अब तक बाइस लोगों की मौत हो चुकी है और बहुत से लोग घायल हैं! ड्यूटी पर तैनात एक हेडकांस्टेबल रतन लाल की इसी हिंसा में मौत हो चुकी है !आखिर रतन लाल ने किसी का क्या बिगाड़ा था वो तो बीमार थे फिर भी अपनी ड्यूटी कर रहे थे! उनके परिवार ने जो     खोया है उसकी भरपाई कोई नहीं कर पाएगा! उनकी पत्नी और तीनों बच्चे जिस दुख और तकलीफ़ से गुजर रहे हैं उसकी अनुभूति इन दंगाइयों को कभी नहीं होगी!                        
 शहीद हेड कांस्टेबल रतन लाल

हेड कांस्टेबल रतन लाल का परिवार 

            आखिर हिंसा को शुरू होते ही क्यों नहीं कुचल दिया
गया !किसकी कमी रह गई, शासन की या प्रशासन की! ये तो नहीं  पता कि मरने वालों में कितने उपद्रवी हैं और कितने निर्दोष लोग हैं! जब दिल्ली पुलिस पर्याप्त नहीं थी इस हिंसा को नियंत्रित करने में तो पहले से ही अर्ध सैनिक बल क्यों नहीं तैनात किये गए!  किस बात का इंतजार किया जा रहा था, ट्रंप के जाने का या फिर कुछ और! हिंसा को शुरुआत में ही नियंत्रित कर दिया जाता तो शायद इतने लोग नहीं मरते! 
                 दिल्ली हिंसा पर कड़े कदम उठाए जाने की जरूरत है !यह राजनीति करने का वक्त नहीं है, यह एकजुट होकर शांति स्थापित करने का समय है! इस हिंसा को साम्प्रदायिक चश्मे से देखने की भी जरूरत नहीं है! क्योंकि यदि इसे हिन्दू और मुस्लिम का रूप देने की कोशिश की गई तो यह रुकने के बजाय और उग्र होगी क्योंकि कट्टर लोग  दिमाग से नहीं दिल से फैसले लेते हैं!                       

    --डॉ सीमा सिंह 
  
       
                 
                   


Monday, February 24, 2020

भारत और अमेरिका की दोस्ती नई ऊँचाइयों पर


     अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की उनके इस कार्यकाल में
पहली स्टैंडअलोन यात्रा भारत की हुई, वह सिर्फ भारत में 36 घंटे के प्रवास के लिये आठ हजार मील की यात्रा करके आए! ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई अमेरिकी राष्ट्रपति इतनी दूर सिर्फ भारत की यात्रा पर आए और पाकिस्तान या अन्य किसी देश की यात्रा किये बिना ही सीधे अमेरिका वापस चला जाए!
        राष्ट्रपति ट्रंप का भारत पहुँचने से पहले उत्साहित होकर बार-बार ट्वीट करना यह बताता है कि उनके लिये ये यात्रा कितनी अहम है! यहाँ आकर अपने भाषण में भारत की, भारत के लोगों की, यहाँ की सांस्कृतिक विविधता की, यहाँ के बॉलीवुड की, यहाँ के क्रिकेटर्स की और प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ़ करना भारत के बढ़ते कद को प्रदर्शित करता है!
साबरमती आश्रम में दोस्ताना अंदाज में 

      राष्ट्रपति ट्रंप का भारत ने बहुत ही शानदार स्वागत किया, और इस स्वागत से वो अभिभूत भी  दिखाई दिये!अहमदाबाद एअरपोर्ट से मोटेरा स्टेडियम तक बाइस किलोमीटर के रोड शो में उन्हें जो सांस्कृतिक विविधता और लोगों का प्यार मिला और फिर एक लाख से अधिक लोगों से खचाखच भरे मोटेरा स्टेडियम में भारत का पलक पांवड़े बिछाना उनके दिल में ताउम्र रहेगा,ऐसा उन्होंने कहा भी था! 
मोटेरा स्टेडियम में 
     
      राष्ट्रपति ट्रंप की इस यात्रा को अमेरिका में आने वाले राष्ट्रपति चुनावों से जोड़ा जा रहा है, यह कहना गलत भी  नहीं है क्योंकि अमेरिका में इतने भारतीय हैं कि उनके वोट के बिना ट्रंप का दोबारा राष्ट्रपति बनने का सपना अधूरा रह सकता है! 
           इक्कीसवीं सदी में अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते अच्छे हुए हैं, इसकी शुरुआत अटल बिहारी जी की सरकार के समय तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा से माना जाता है! इसके बाद जॉर्ज बुश और बराक ओबामा से होते हुए अब डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में रिश्तों में सुधार जारी है! प्रधानमंत्री मोदी का किसी भी राष्ट्राध्यक्ष से गर्मजोशी से मिलना और एक निराले अंदाज में उन्हें अपनी संस्कृति से रूबरू कराना सभी को भाता है, प्रधानमन्त्री मोदी का यही अंदाज राष्ट्रपति ट्रंप को भी भा गया है! 
            आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका और भारत दोनों को एकजुट होकर संयुक्त प्रयास की आवश्यकता है जिसका जिक्र राष्ट्रपति ट्रंप ने कल के अपने भाषण में किया भी था! लेकिन भारत की धरती पर खड़े होकर उनका पाकिस्तान से अपने अच्छे रिश्तों को बताना उचित नहीं था! 
             रक्षा क्षेत्र में भारत और अमेरिका के मध्य तीन अरब डॉलर की डील होने की संभावना है!  साथ ही यदि व्यापार, निवेश, ऊर्जा आदि पर भी कोई बात हो जाए तो अच्छा होगा! वर्तमान में भारत का अमेरिका के साथ निर्यात 52.4 यू. एस. बिलियन डॉलर है और आयात 35.5 यू. एस. बिलियन डॉलर है! भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा भविष्य में दोनों देशों के संबंधों की प्रगाढ़ता को बढ़ाने में सहयोगी साबित होगी! 
                              भारत को बेशक अमेरिका से रिश्ते प्रगाढ़ करना फायदेमंद है किन्तु साथ ही हमारे सर्वकालिक मित्र देश रूस के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाए रखने की चुनौती भी है! भले ही रक्षा डील के अलावा कोई अहम डील नहीं होने वाली है किन्तु राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा दोनों देशों के रिश्तों को एक नई ऊँचाई पर ले जाती हुई दिख रही है! 
                 --डॉ सीमा सिंह 

Friday, February 21, 2020

महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर ये भी जानिये कि शिव और शंकर में क्या अंतर है

      शिव का अर्थ -
                 शिव ही परमात्मा हैं और शिव का अर्थ है कल्याणकारी ! ऐसा माना जाता है कि परमात्मा शिव जन्म नहीं लेते क्यों कि वे तो स्वयं ही सबके माता-पिता हैं!
                 अधिकांश लोग शिव और शंकर को एक ही मानते हैं परन्तु वास्तविकता ये नहीं है! शिव और शंकर में भिन्नता है! जिसे हम शिवलिंग कहते हैं असल में वही शिव हैं! शिव और शंकर की प्रतिमाएँ अलग प्रकार की होती हैं!
शंकर की प्रतिमा शारीरिक आकार लिये होती है!
शिव की प्रतिमा 
   शिव का शरीर नहीं होता है, शिव तो सिर्फ एक ज्योति हैं!जबकि शंकर जी शरीर धारण करते हैं! शंकर को ही महादेव कहा जाता है! शिव को परमात्मा कहा जाता है लेकिन शंकर को परमात्मा नहीं कहा जा सकता! शंकर जी को शिव जी की रचना माना जाता है क्योंकि शिव ही रचयिता हैं!                
शंकर की प्रतिमा 
शंकर जी तो स्वयं शिव की आराधना करते हैं! ऐसी मान्यता है कि शिव मुक्तिधाम में वास करते हैं जबकि शंकर जी शंकरपुरी में निवास करते हैं !शिव जी विश्व का कल्याण करते हैं! मान्यताओं के मुताबिक सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा जी हैं, सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु जी हैं और सृष्टि का विनाश शंकर जी के द्वारा किया जाता है! इन तीनों के भी रचयिता हैं शिव! 
          शिवरात्रि अर्थात परमात्मा शिव का अवतरण! परमात्मा शिव अवतरित होकर सभी आत्माओं में आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न करते हैं!रात्रि वास्तव में अविवेक, पाप, तमोगुण की निशानी है, विषय -विकारों का अंधकार होता है तभी शिव जन्म लेते हैं, यही कारण है कि शिव दिन नहीं बल्कि शिवरात्रि कहा जाता है !                            
शिव के अवतरित होते ही प्रकाश सारे विश्व में फैल जाता है, अंधकार और विकारों का विनाश हो जाता है! विकार अर्थात काम, क्रोध, लोभ, मोह सभी का विनाश शिव ही तो करते हैं! 
शिव शान्ति देते हैं, शिव सुख देते हैं और शिव ही पवित्रता प्रदान करते हैं!                                                      
--डॉ सीमा सिंह 

Friday, February 14, 2020

In the memory of martyrs of Pulwama attack


   पुलवामा हमले की बरसी -- आज ही के दिन एक वर्ष पहले पुलवामा में हमारी भारतीय सेना के 40 बहादुर वीरों  की शहादत हुई थी!  आतंकवादियों द्वारा भारतीय सेना के एक जत्थे पर किये गए अमानवीय हमले में 40 परिवारों का चिराग बुझ गया था! हमारे मुल्क का प्रत्येक  वाशिंदा जो अपने मुल्क से बेपनाह मोहब्बत करता है, उस दिन बहुत रोया था!
       मोहब्बत का दिन 14 फरवरी ही चुना था उन्होंने भी अपने वतन से मोहब्बत करते हुए अपनी जान लुटाने  को! 
        यह पूरा वतन उन शहीदों को सलाम करता है जिन्होंने हमारी हिफ़ाज़त में अपने प्राण न्यौछावर कर दिये! हम उनके परिवारों के कर्जदार हैं जिनके घर की एक मात्र रोशनी हमारे घरों को रोशन करने में बुझ गई! आज फिर से उस हमले की यादें ताजा़ हो गयीं और हमारी आँखें फिर से नम हो गईं !
                आपकी कुर्बानी हमारे दिलों में हमेशा  जिन्दा रहेगी  ! आप सभी वो कोहिनूर हैं  जो बनने की हसरत प्रत्येक  वीर बहादुर  की होती है.... ये देश आपका सदैव  कर्जदार रहेगा  !
                      उन 40 परिवारों  पर क्या गुजरती होगी ये तो जान पाना और समझ पाना किसी के बस की बात नहीं है लेकिन उनका थोड़ा सा दर्द बांटने की कोशिश जरूर की जा सकती है  ! हर घर की अलग कहानी है लेकिन हर कहानी में बेइंतहाँ दर्द  भरा हुआ है  ! जो शादीशुदा थे उनकी पत्नियाँ  सिर्फ  यादों के सहारे अपने जीवन  को काटेंगी  ,जब -जब अपने शहीद पति को याद करेंगी  तब-तब उनकी आँखें आँसुओं से भर जाएंगी  !
                जिन बच्चों के सिर से बाप का साया सदा के लिये  उठ गया, उनके दुख को बयाँ करने के लिये  शब्द नहीं हैं  ! वो माँ - बाप जो उम्मीद लगाए बैठे थे कि उनका बेटा उनके बुढ़ापे का सहारा बनेगा  ,आज उनकी चिता को आग देने वाला ही नहीं  रहा  ! प्रत्येक परिवार को इन सब दुखों के बावजूद अपने  शहीद सपूत पर गर्व है  !कई परिवार तो ऐसे भी  हैं जो अपना एक बेटा देश पर कुर्बान करने के बावजूद चाहते हैं कि काश उनका एक और बेटा होता जिसे वो भारत माँ  की सेवा में भेज पाते  !
                     धन्य हैं वे परिवार और वे माताएँ जो देश पर कुर्बान होने के लिये अपने कलेजे के टुकड़े को हँसते - हँसते रुख़सत कर देते हैं  !
                                       -डॉ सीमा सिंह 

Wednesday, February 12, 2020

Citizenship Amendment Act 2019 is necessary or could be postponed

    नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 को लागू करना कितना जरूरी है और कितना गैर जरूरी! ये तो भावनात्मक विश्लेषण का मुद्दा है किन्तु समझना और समझाना दोनों ही हठधर्मिता का शिकार हैं! ये बात पूर्णतया सत्य है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के लागू होने से किसी भी  भारतीय की नागरिकता नहीं जाएगी, वो चाहे किसी भी धर्म का हो!
        भारतीय मुस्लिमों को जरा सा भी घबराने या डरने की आवश्यकता नहीं है! ये कानून तो धर्म के आधार पर सताए गए पाकिस्तानी, अफगानिस्तानी और बांग्लादेशी अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के लिये है! वो भी  2014 तक जो लोग भारत में आ गए थे और यहाँ शरणार्थी के रूप में जीवन गुजार रहे थे!
          इस कानून का विरोध करने वाले दो तरह का मत रखते हैं, एक तो वो हैं जो यह कह रहे हैं कि इस कानून को वापस ले लो क्योंकि हमारे देश में पहले से ही बहुत अधिक जनसंख्या है,  दूसरे वो लोग हैं जो यह कह रहे हैं कि इसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के मुस्लिमों को क्यों नहीं शामिल किया गया!  ये बात पूर्णतया सत्य है कि हमारे देश में पहले से ही बहुत अधिक जनसंख्या है, भौतिक संसाधनों पर अनावश्यक बोझ बढ़ाने से क्या फायदा! लेकिन जरा गौर से संवेदनशील होकर सोचिये तो देख पाएंगे कि ये अल्पसंख्यक लोग इस्लामिक देशों में धर्म के आधार पर प्रताणित किये गए हैं जिसके कारण वो भारत में शरणार्थी बनने को मजबूर हुए!
                        गांधी जी ने भी भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय इस बात का जिक्र किया था कि यदि अल्पसंख्यक भाई बन्धु वहाँ खुश न हों तो भारत में उन्हें आने दिया जाएगा! और आज इस नागरिकता संशोधन अधिनियम के माध्यम से गांधी जी का सपना ही तो पूर्ण किया गया है! रही बात इन तीनों देशों के मुस्लिमों को इस कानून में न शामिल करने की तो ये तो सभी को स्पष्ट है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश इस्लामिक देश हैं और किसी इस्लामिक मुल्क में इस्लाम को मानने वाले के साथ धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता है और न ही वह प्रताणित किया जाता है!
                         इतनी मामूली सी बातें सभी को समझ में आ जाती हैं तो फिर नागरिकता संशोधन अधिनियम का इतना अधिक विरोध क्यों किया जा रहा है!  जब किसी की नागरिकता खतरे में नहीं है तो फिर राष्ट्रीय सम्पत्ति की बर्बादी करना, सार्वजनिक रास्ते को दो महीने से रोके रखना किस संविधान में लिखा है! ये सिर्फ राजनीतिक पार्टियों तथा कुछ विशेष लोगों के द्वारा भ्रम फैलाकर हिन्दू-मुस्लिम विभाजक विचारधारा को पोषित करने व सरकार की खिलाफत करने की साजिश मात्र है!
                         नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोधी कहते हैं कि हम कागज नहीं दिखाएंगे, मैं उन लोगों से यह निवेदन पूर्वक कहना चाहती हूँ कि जब हम अन्य कामों के लिये समय- समय पर कुछ न कुछ कागज जरूर दिखाते हैं तो फिर नागरिकता के लिये क्यों नहीं! आधार कार्ड, पासपोर्ट, डी एल, राशन कार्ड, बिजली का बिल जैसे न जाने कितने कागज हर नागरिक के पास होते हैं तो फिर यह हठधर्मिता क्यों? और वैसे भी अभी एन आर सी तो आया नहीं है और आएगा  भी तो जो कागज मांगे जाएंगे वो प्रत्येक नागरिक के पास होते हैं तो फिर डर कैसा!
                        एक अफवाह है कि पूर्वजों के जन्म प्रमाण पत्र मांगे जाएंगे, अरे 2000 ई.से पहले पैदा हुए लोगों के पास तो अपना ही जन्म प्रमाण पत्र नहीं  है तो पूर्वजों का कहाँ से दिखाएंगे! ऐसा कुछ भी नहीं मांगा जाएगा, यदि गलती से भी ऐसा हुआ तो हम भी आन्दोलन करेंगे! सरकार किसी को परेशान नहीं कर सकती वो तो सिर्फ अपने देश की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है!
                         -डॉ सीमा सिंह 

Justice to Nirbhaya is still pending

   हमारे देश में बलात्कार के अपराध तो रोज होते हैं, लेकिन अपराधियों को सजा नहीं मिलती! यदि मिलती भी है तो कानून की जटिल प्रक्रिया उन अपराधियों को सालों साल बचाती रहती है!  किसी के मन में किसी भी प्रकार का कोई भय नहीं दिखाई देता! भय तो सजा से ही आ सकता है और सजा किसी को मिलती नहीं!
          हजारों - लाखों बलात्कार की घटनाओं में से दो चार घटनाएँ  ऐसी होती हैं जो मीडिया में उछलती हैं, जिनसे देश जागता है,और पीड़ित के लिये न्याय मांगता है !ऐसा लगता है कि ये घटना आखिरी घटना होगी इसके बाद दुबारा कभी किसी लड़की का बलात्कार नहीं होगा! ऐसी ही एक घटना दिसंबर 2012 में देश की राजधानी दिल्ली में घटित हुई थी जिसमें क्रूरता और जंगलीपन की सभी हदें पार हो गईं थी!
पूरा देश सड़कों पर आ गया था, निर्भया के लिये जल्द न्याय की गुहार लगा रहा था!  आरोपी पकड़े गए, उन्हें मृत्युदण्ड की सज़ा भी सुनाई गई थी!
              अब हम 2020 में जी रहे हैं लेकिन अभी भी उन बलात्कारियों को मृत्युदण्ड नहीं मिला है, वो जीवित हैं क्योंकि उनके वकील किसी न किसी कानूनी दाँवपेंच से उन्हें बचा लेते हैं और उनकी फांसी फिर टल जाती है! कोई पीड़िता या उसका परिवार कैसे करें कानून और न्याय पर भरोसा! इन चारों बलात्कारियों को देर सबेर फांसी मिल भी जाएगी लेकिन क्रूरतम अपराध को अंजाम देने वाला इन चारों बलात्कारियों का नाबालिग साथी तो जिन्दा घूम रहा है और घूमता रहेगा! वो तो 17 वर्ष का था, यदि वह 14 वर्ष का भी होता तब भी उसे फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिये था!  जो इतना घिनौना अपराध कर सकता है उसे नाबालिग कहना भी शर्मनाक है!
            क्या उसमें कोई सुधार हुआ होगा, यह कह पाना बहुत ही मुश्किल है! आपराधिक मानसिकता ऐसे नहीं जाती!
वो हमारे समाज के लिये अभी भी खतरा है! मैं मानवाधिकारों का समर्थन करती हूँ लेकिन बलात्कारियों के  मानवाधिकारों के मामले में कुछ बदलाव की जरूरत है! ये बलात्कारी किसी लड़की की इज्जत को तार-तार तो करते ही हैं, साथ ही उसकी आत्मा को भी  नोंच खाते हैं और आजकल तो तुरन्त हत्या भी  कर डालते हैं!इनके मानवाधिकारों की बात करने वाला बलात्कार पीड़ित लड़की व उसके परिवार के मानवाधिकार क्यों भूल जाता है.. !
                  निर्भया के बलात्कारियों की फांसी जिस तरह से टल रही है, उससे तो यही लगता है कि हैदराबाद में 2019 में लेडी वेटेरिनरी डॉक्टर के गैंगरेप व हत्या के दोषियों का एनकाउंटर किया जाना बिल्कुल सही था! हमारी कानून व्यवस्था एनकाउंटर करने वाले पुलिस अधिकारियों को तो आड़े हाथ ले लेगी लेकिन दोषियों को बचने के हजार मौके देती रहेगी! इस कानून व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है!
                         -डॉ सीमा सिंह

Tuesday, February 11, 2020

Delhi elections 2020

आज 11 फरवरी 2020 को दिल्ली विधान सभा चुनाव परिणाम देखने के बाद ये प्रतीत होता है कि अब दिल्ली में केजरीवाल और उनकी पार्टी को हराना बहुत मुश्किल हो चुका है! बीजेपी और कांग्रेस की हार ने साबित कर दिया है कि जब तक आप ज़मीनी मुद्दों के प्रति संजीदगी से काम नहीं करेंगे तब तक जनता नकारती रहेगी!
           कांग्रेस का तो 2015 की तरह फिर से सूपड़ा साफ हो गया और देश की सबसे पुरानी पार्टी शून्य सीट के साथ तीसरे नंबर पर काबिज है!  ये हार बीजेपी के लिये  भी शर्मनाक है क्योंकि दिल्ली में सभी सांसद उनके हैं, केंद्र सरकार उनकी है और वर्तमान में देश की सबसे बड़ी पार्टी महज सात सीटों पर सिमट गई!
               बीजेपी तो इस बात को अच्छी तरह जानती है कि जनता सिर्फ विकास मॉडल पर वोट देती है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर आने का एक मात्र कारण विकास की बात थी!  आज की पढ़ी लिखी जनता हिन्दू-मुस्लिम, भारत -पाकिस्तान, धारा 370 ,शाहीन बाग, राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर वोट नहीं करती! जनता उसको वोट देगी जो बिजली सस्ती देगा, पानी मुफ्त देगा, जो शिक्षा की बात करेगा, स्वास्थ्य की बात करेगा, सड़क, सीसीटीवी कैमरे की बात करेगा...! सिर्फ इतना ही नहीं दिल्ली की महिलाओं को फ्री मेट्रो की सुविधा जिसने दी है उसको तो वो वोट करेंगी ही!
             जनता फ्री के साथ तो हमेशा जाती है, साथ ही केजरीवाल से बेहतर कोई ऑप्शन भी तो नहीं था दिल्ली में!
यही जनता लोकसभा चुनावों में मोदी के पक्ष में वोट करती है लेकिन दिल्ली विधानसभा के चुनाव में दमदार मुख्यमंत्री चाहती है जिसका चेहरा न बीजेपी के पास है और न ही कांग्रेस के पास! सिर्फ एक ही ऑप्शन है दिल्ली के पास और वो हैं केजरीवाल!
         कांग्रेस ने कोशिश भी नहीं की जीतने की, जिसका सीधा फायदा आम आदमी पार्टी को मिला और नुकसान बीजेपी को!  यदि कांग्रेस कुछ बेहतर प्रदर्शन करती तो बीजेपी की सीटें जरूर बढ़ी होतीं और आम आदमी पार्टी की कुछ सीटें कम हुई होतीं! बीजेपी  ने 2015 की 3 सीटों के मुकाबले सिर्फ 7 सीटें हासिल की, इस मामूली बढ़त को बढ़त नहीं कहेंगे!  यदि बीजेपी 25 सीट तक भी  हासिल करती तो माना जा सकता था कि थोड़ी बहुत टक्कर दे पाए हैं!
                 अब बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ईमानदारी से अपना आंकलन करना होगा कि दिल्ली विधानसभा के अगले  चुनाव में क्या वो अपना अस्तित्व बचा पाएंगी या इसी तरह दिल्ली की परिधि से बाहर होना है!
                                               -डॉ सीमा सिंह